सीटी क्लब सिविल लाइन मीरजापुर के सभागार में भाजपा जिलाध्यक्ष बृजभूषण सिंह की अध्यक्षता सेवा पखवाड़ा के अंतर्गत पं. दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य अतिथि / वक्ता पूर्व प्रदेश अध्यक्ष / पूर्व केन्द्रीय मंत्री भारत सरकार डॉ0 महेन्द्र नाथ पाण्डेय रहे। संगोष्ठी का शुभारम्भ मुख्य अतिथि तथा भाजपा जिलाध्यक्ष पं0 दीनदयाल उपाध्याय के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्ज्वलित किया। तत्पश्चात् भाजपा जिलाध्यक्ष कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आये हुए मुख्य अतिथि एवं मंसाचीनगणों व सामने बैठे हुए सभी प्रबुद्धगण, भाजपा पदाधिकारीगण एवं कार्यकर्तागणों का स्वागत अभिनंदन किया और कहा कि पं. दीनदयाल के दर्शन का सबसे अनमोल रत्न है— अंत्योदय । वो कहा करते थे “नीति याँ केवल धनी और शक्तिशाली के लिए नहीं होनी चाहिए, बल्कि सबसे गरीब, सबसे निर्बल और सबसे उपेक्षित के उत्थान के लिए होनी चाहिए। आज हम गर्व से कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने इस अंत्योदय के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप में बदल दिया है। अब गरीबों के पैसे सीधे उनके बैंक खातों में जा रहे हैं । आज गरीब परिवार को मुफ्त इलाज दिया जा रहा है। लाखों गरीब परिवारों को पक्के घर मिले, शौचालयों के निर्माण से करोड़ों परिवारों को गरिमा और सुरक्षा मिली।आज मोदी के नेतृत्व में हम गर्व से कह सकते हैं कि अंत्योदय अब केवल दर्शन नहीं, बल्कि धरातल पर जीता-जागता यथार्थ है।जब अंतिम व्यक्ति उठेगा, तभी भारत उठेगा। यही दीनदयाल जी का सपना था। इसी क्रम में मुख्य अतिथि जी संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बताया कि आज हम सब एक महान तपस्वी, एक दूरदर्शी विचारक और राष्ट्र नायक का स्मरण करने के लिए एकत्र हुए हैं । वह विभूति है, पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी, जिनका जन्म 25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश में हुआ था । आज हम केवल उनके जयंती का उत्सव नहीं मना रहे हैं, बल्कि उनकी विचारों को भी स्मरण कर रहे हैं । उनके जीवन से हमें यही सीख मिलती है कि भारत को अपनी आत्मा, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं के सहारे ही आगे बढ़ना है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत को केवल एक दृष्टि ही नहीं दी, बल्कि एक मार्ग भी दिया – वह मार्ग है ‘एकात्म मानववाद’ का । यह दर्शन केवल एक सिद्धांत नहीं है, यह हमारी सनातन भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जो जीवन के हर आयाम में संतुलन और समरसता का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि पं. दीनदयाल जी का जीवन बहुत कठिनाइयों से भरा रहा। उनके माता-पिता का निधन बाल्यावस्था में ही हो गया था । बाद में इनके भाई का भी स्वर्गवास हो गया । ऐसा दुख किसी को भी तोड़ देता है, परंतु दीनदयाल जी ने उस पीड़ा को राष्ट्र के लिए आजीवन तपस्या में बदल दिया । वे विलक्षण छात्र थे, पर उन्होंने सत्ता, धन या भौतिक सुख का मार्ग नहीं चुना । उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बनकर स्वयं को पूर्णतः राष्ट्र सेवा को समर्पित कर दिया। राष्ट्र वाद की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचने के लिए, उन्होंने 1951 में श्यामा प्रसाद मुख़र्जी के साथ भारतीय जनसंघ की स्थापना की। पंडित केवल 52 वर्ष का जीवन जिए, परंतु उनकी धरोहर आज भी हमें दिशा देती है।