अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान- दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आइसार्क) और अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र (सिप) ने वाराणसी में एक संयुक्त बहु-हितधारक बैठक का आयोजन किया। इस बैठक का उद्देश्य एक नई मशीनरी नवाचार का मूल्यांकन करना था, जिसे ‘पोटैटो ज़ीरो टिलेज विद राइस स्ट्रॉ मल्च (PZTM)’ नामक तकनीक को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया है। यह तकनीक चावल–आलू की फसल प्रणाली को अधिक टिकाऊ, जलवायु-लअनुकूलऔर संसाधन-कुशल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। बैठक में सरकारी अधिकारी, सीजीआईएआर केंद्रों के प्रतिनिधि, एग्री-टेक कंपनियां, फूड प्रोसेसिंग कंपनियां, विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता और किसान संगठनों के सदस्य शामिल हुए। चर्चा के केंद्र में कॉम्बाइन हार्वेस्टर का एक नया प्रोटोटाइप था, जिसे ज़ीरो-टिल आलू-प्लांटर के साथ जोड़ा गया है। यह मशीन एक ही बार में धान की कटाई के बाद बचे भूसे को संभालते हुए उसी खेत में आलू की बुवाई कर सकती है। यह पहल कृषि प्रणाली-आधारित यंत्रीकरण की ज़रूरत को सामने लाती है, जो फसल विविधीकरण, जलवायु-अनुकूल खेती, फसल अवशेषों के उपयोग और छोटे किसानों के लिए समावेशी नवाचार जैसे जटिल मुद्दों को ध्यान में रखती है। इस तकनीक के ज़रिए आलू की बुवाई धान की कटाई के बाद सीधे खेत में मौजूद भूसे का उपयोग कर की जा सकती है। यह भूसा खेत में प्राकृतिक मल्च का काम करता है और गहरी जुताई की ज़रूरत नहीं पड़ती। इससे मिट्टी की सेहत बेहतर होती है, नमी बनी रहती है, सिंचाई और खाद की ज़रूरत घटती है, और मज़दूरी का खर्च भी कम हो जाता है। सामान्यत: जब मशीन से धान की कटाई होती है, तब खेत में भूसा और ठूंठ रह जाते हैं, जो पारंपरिक तरीके से आलू लगाने में बाधा बनते हैं। यह नया प्रोटोटाइप इस समस्या को हल करता है, और धान की कटाई के तुरंत बाद ही उसी प्रक्रिया में आलू की बुवाई कर सकता है। उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है और धान उत्पादन में भी अग्रणी है, इस तकनीक को लागू करने के लिए एक उपयुक्त क्षेत्र बन गया है। उत्तर प्रदेश सरकार के उद्यान विभाग की ओर से बी.एल. मीणा, अपर मुख्य सचिव (उद्यान), ने इस बैठक में भाग लिया। उन्होंने कहा कि ऐसे नवाचारों को राज्य की मौजूदा योजनाओं से जोड़कर बड़े स्तर पर लागू किए जाने की आवश्यकता है। डॉ. सुधांशु सिंह, निदेशक, आइसार्क ने कहा, “उत्तर प्रदेश में अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र (सिप) के साउथ एशिया रीजनल सेंटर का होना एक अच्छा संकेत है। इससे दोनों संस्थानों के प्रयासों में तालमेल बढ़ेगा, जो राज्य की कृषि प्रणाली के लिए लाभकारी है।